1.पाचन संस्थान के मुख्य अंग कौन कौन से हैं।
1.मुख
यह वह छिद्र है जो हमारे चेहरे में नाक के नीचे दो होठों से ढका रहता है। होंठ खोलने पर जो रास्ता या छिद्र दिखता है, वह मुंह है।
मुखगुहा-
मुंह से लेकर ग्रसनी से प्रारंभ तक का भाग मुखगुहा कहलाता है। यह मुखगुहा ऊपर की ओर तालू से घिरी रहती हैं। तालू का अगला भाग कड़ा तथा पीछे का भाग मुलायम होता है। दाये-बाये गाल तथा नीचे की ओर जीभ होती है। तालू, गाल, जीभ से घिरा यह भाग मुखगुहा कहलाता है।
जीभ -
(1) बहिस्थ मासपेशियां
इसके कारण जीभ की गति तीव्र रहती है। इन मासपेशियों की गति के कारण हम मुखगुहा में भोजन इधर-उधर करते है। चबाने में तथा भोजन निगलने में इसकी गति से मदद मिलती है।
(2) अन्त पेशी
जीभ की धीमी गति इन्ही पेशियो के कारण होती है।
सामान्य अवस्था में हमारी जीभ चौड़ी होती है, पर जब हम इसे मुखगुहा से बाहर निकालते है, तो ये आगे से नुकीली दिखायी देती है। जीभ के ऊपर अनेक स्वादुकर होते है। ये स्वादुकर उभारदार होते है, जिनके द्वारा हमें भोजन का स्वाद पता चलता है।
जीभ के आगे के भाग -
मीठा, पीछे वाला भाग तीखा, दाये-बाये और खट्टा तथा नमकीन स्वादुकर पूरी जीभ में होते है।
जीभ के कार्य -
1.भोजन का स्वाद बताना।
2.मुंह के विभिन्न आवाजें निकालने मे सहायक।
3.मुंह में भोजन चबाने में सहायक।
4.भोजन निगलने में सहायक।
दात -
मुखगुहा में जीभ भोजन को इधर-उधर होने में सहायता करती है, तो दात भोजन को काट-पीस कर टुकडों में कर देते है, ताकि पाचन क्रिया आसान हो सके।
मनुष्य के दात दो प्रकार के होते है।