1.रक्त कणिकाएं
रक्त कणिकाएं 3 प्रकार की होती है, जो कि रक्त प्लाज्मा में तैरती रहती है-
लाल रक्त कणिकाएं
ये बहुत ही छोटी, गोल व प्लेट के आकार की होती है, जिसके दोनों छोर कुछ दबे हुये होते हैं।
मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कण अस्थि मज्जा में तैयार होते है। सबसे अधिक लाल रक्त कण रीढ़ की अस्थि मज्जा में होता है। जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तब उसके शरीर में प्लीहा में लाल रक्त कणों का निर्माण होता है। लाल रक्त कणों की विशेषता यह है कि इनका लाल रंग हीमोग्लोबिन वर्णक के कारण होता हैं। इनके निर्माण की प्रारम्भिक अवस्था में हीमोग्लोबिन कम मात्रा में होता है इस समय लाल रक्त कणिका में केन्द्रक पाया जाता है। किन्तु जब इसमें हीमोग्लोबिन की मात्रा पूर्ण हो जाती है,
यह परिपक्व हो जाती है, तो इसका केन्द्रक समाप्त हो जाता है और यह रक्त प्लाज्मा में जाकर मिल जाती है। लआल रक्त कण में आर० एच० एन्टीजन होता है लाल रक्त कण का जीवन 90-120 दिन का होता हैं। जीवन पूरा होने पर प्लीहा यथा यकृत द्वारा तोड दी जाती है। इनका जीवन समाप्त होने पर इनका लौह लवण नयी लाल रक्त कणिकाओ के निर्माण हेतु अस्थि मज्जा में भेज दिया जाता है। लाल कणिकाओं के निर्माण हेतु लौह लवण के साथ - साथ फालिक एसिड तथा जीवन सत्य बी 12 भी चाहिए होता हैं।
सूक्ष्मदर्शी यंत्र से लाल रक्त कणिकाएं अलग-अलग देखने पर पीले रंग की दिखती है पर समूह में लाल दिखाई देती है। रक्त में लाल रक्त कणिकाओं की संख्या सबसे अधिक होती है। घन मिलीमीटर ( एक बूद ) में करीब 50 लाख लाल रक्त कणिकाएं होती है। स्त्रियों के शरीर में करीब 45 लाख होती है।
लाल रक्त कणिकाओं के कार्य-
(1) शरीर की प्रत्येक कोशिका तक ऑक्सीजन पहुंचाना तथा अशुध्द कार्बन-डाइ-आक्साइड फेफड़ो तक पहुंचाना।
(2) अम्ल तथा क्षार की मात्रा सन्तुलित रखना।